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Ahmad Rizvi
यहूदी इसराइल
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यहूदी इसराइल चारो ओर दुश्मन देशों से घिरा हुआ है..... यह झूठ लगातार बोला जाता है हक़ीक़त में यहूदी इसराइल चारो ओर दोस्तो से घिरा है एक ओर जॉर्डन जो ईरानी मिसाइल को मार गिराने में अहम भूमिका निभाई, दूसरा वो मोहम्मद अल जुलानी जो वर्तमान में सीरिया का राष्ट्रपति बन गया है वो अमेरिका इसराइली यहूदी और तुर्की का मित्र है मिश्र का कैंप डेविड समझौता के बाद यहूदी इसराइल का दोस्त है उत्तर में लेबनान देश है जहां ईसाई राष्ट्रपति है और आर्मी चीफ ईसाई है जिसके ताल्लुकात अमेरिका और यहूदी इसराइल से है अब दक्षिण में लाल सागर और सऊदी अरब है जो अमेरिका और यहूदी इसराइल के दोस्त है अब पूर्व में वेस्ट बैंक है जहां फिलिस्तीन की अगवाई महमूद अब्बास कर रहे हैं जो यहूदी इसराइल के दोस्त हैं अब जो अमेरिका यहूदी इसराइल के साथ है वो अमेरिका इन सब देशों के साथी है तो दरअसल यहूदी इसराइल चारो ओर दोस्तो से घिरा है दुश्मनों से नहीं मगर यहूदी इसराइल भारत का भी दोस्त है इसलिए भारत की मीडिया यहूदी इसराइल को मासूम साबित करने के लिए उसे दुश्मनों से घिरा हुआ बताते है और यह भी साबित करने की कोशिश की जाती है कि यहूदी इसराइल इस्ल...
मौला अली साबिक अम्बिया से अफज़ल है
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मौला अली साबिक अम्बिया से अफज़ल है । कुछ मुसलमान अपने इल्म की कमी के कारण या मौला अली से बुगज़ रखने के कारण उनके दिमाग मे सवाल पैदा होते है और सार्वजनिक (public) प्लेटफार्म पर ऐसे सवाल उठाते भी है । आज इन सवालातों के जवाब को तलाश करते है। मौला अली अंबियाओ से अफज़ल है तो इसकी कोई दलील है , जी हाँ, इसकी दलील है । सवाल : क्या नबी करीम मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम नबीयों, अमबीयाओ, रसूलों, मलायका (फरिश्तों) और जिन्नतों के मौला है ? जवाब : जी हाँ , नबी करीम मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम नबीयों, रसूलों, अम्बियाओ, मलाएका, और जिन्नतों से न केवल अफज़ल बल्कि मौला है जब अल्लाह सुभान व तआला ने आदम के पुतले मे जान डाली तो हुक्म दिया मलाइका और जिन्न को सजदा हज़रत आदम का करना । फखरे अम्बिया सबसे अफज़ल है । सवाल : क्या ईसाई यहूदी मुशरिक काफिर के भी आप मौला है ? जवाब : नहीं , जो नबी करीम मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम को मौला नहीं मानता है उसको अख्तियार है कि मौला न माने । सवाल : क्या हज़रत ईसा के भी मौला है नबी करीम मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ? ज...
विदअत
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विदअत क्या है इस्लाम मे विदअत ऐसे कार्य को करना है जो हुक्म अल्लाह सुभान व तआला व रसूल उल्लाह मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने न किया हो । ज़ाहिल (अज्ञानी) मोलवी ने “रोने को विदअत” कहना शुरू किया वो इसलिए कि आले मोहम्मद इमाम हुसैन और उनके कराबतदारों, मेहमान और दोस्तों को कर्बला मे शहीद कर दिया गया । आले मोहम्मद से मोहब्बत करने वाले लोग अपनी मोहब्बत मे उन पर होने वाले ज़ुल्म पर रोते है । यज़ीद और उसके बाप मुआविया लानत उल्लाह अलैह से लगाव रखने वाले और उनसे मोहब्बत करने वाले, हुसैनियों से नफरत करते है और रोने को विदअत कहते है । “रोने को विदअत” कहने वाले उस वक़्त खामोश हो गये जब हज़रत आदम के रोने का जिक्र आया, जब हज़रत याकूब के रोने का ज़िक्र आया, और अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम के रोने का ज़िक्र आया वह भी तब जब हज़रत हमज़ा की शहादत हुई और कर्बला मे इमाम हुसैन की शहादत को पहले से बता देना और गिरया (रोना) करना साबित कर रहा था कि रोना विदअत नहीं बल्कि रोना “सुन्नत-ए- नबवी” है । विदअत अब तक कहाँ कहाँ हुआ है इसको बताने का कलील (संक्षिप्त) को...
अल्लाह क्या सोता है ?
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अगर कोई व्यक्ति यह सवाल करे कि अल्लाह भी सोता है तो लोग उसको जवाब देंगे क्या बेतुकी बात करते हो लेकिन अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इसका जवाब खुद दे दिया कुरान मजीद सूरे बकरा मे इरशाद है “ अल्लाह वही है नहीं है कोई आराध्य/ मआबूद सिवाय अल्लाह के वो ज़िन्दा और कायम है उसे न नींद आती है और न ऊंघ आती है । इसके आगे भी उस रब ने फरमाया है मगर मेरा विषय उपरोक्त है इसलिए मैंने उतना ही विषय को चुना जितना विषय मेरे विषय से संबंधित है । अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपने ज़िन्दा होने को बताया है इसका अर्थ यह है बाकी जितनी जानदार चीज जीवित है इनको मरना है और अल्लाह ज़िन्दा और कायम है बाकी जानदारों की जिन्दगी कायम नहीं है उनको फौत होना है । इससे पहले अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने फरमाया अल्लाह ही है जो आराध्य है बाकी कोई आराध्य नहीं है । उसे नींद और ऊंघ नहीं आती । यहाँ एक और बहुत बड़ी चीज नजर आती है अल्लाह ने अपनी खूबी बतायी है दूसरों की बुराई नहीं की है लेकिन अगर दूसरा पहलू देंखे तो अपने आप समझ मे आ जाएगा । अब जो सोता है ऊँघता है या सुलाया जाता है जगाया जाता है वो आराध्य नहीं हो सकता अल्लाह ही आराध्य है और हो सक...
इस्लाम मे यज़ीदीयों की भूमिका
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इस्लाम दीन अल्लाह का अता किया हुआ दीन है सबसे बड़ी चीज इस्लाम मे कोई है तो वो है “अदल “ । इस्लाम नाइंसाफी को पसन्द नहीं करता है अल्लाह को कोई मानता हो या न मानता हो फिर भी इस्लाम उसकी जान माल की हिफ़ाज़त/ सुरक्षा को प्राथमिकता/ तरजीह देता है । अब इस्लाम को बदनाम करने, आतंक करने, इस्लाम के सिद्धांतों/उसूलों की मुखालफत करने वाला गिरोह कब मज़बूत हुआ । अल्लाह और अल्लाह के नबी पाक की मुखालफत कहाँ से शुरू हुई । शुरुआत से ही नबी पाक की मुखालफत होती रही है यह मुखालफत इस्लाम का हिस्सा कैसे बन गई और आज मुस्लिमों को क्यों ज़िल्लत उठानी पड रही है । बनी उमईया जो अल्लाह और अल्लाह के नबी का विरोध करते थे ने जब से इस्लाम को अपनाया और इस्लाम के उसूलों के खिलाफ काम करना शुरू किया तब से आज तक इस्लाम के उस हिस्से मे खराबी ही खराबी पैदा है जिस हिस्से मे बनी उमैया को हीरो की तरह माना जाता है । उतबा मुआविया का नाना है , और जीगरचबाने वाली हिन्दा का बाप है इसकी बदकिरदारी को इतिहास मे पढ़ सकते है । अबू सूफियान और मुआविया जिनके द्वारा हमेशा नबी पाक की मुखालफत करते रहे है मक्का फतेह के बाद (जो 20 र...
ईरान का फतवा!
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ईरान का फतवा! ईरान के सुप्रीम लीडर ने फतवा दिया है कि परमाणु बम नहीं बनायेगा कारण यह दिया कि सामूहिक रूप से क़त्ल करना हराम है इस बात से सहमत हूं सही बात है हिकमतें अमली भी है फ़िर मन में सवाल पैदा हुआ क्या इस्लाम में अपने लोगों को सामूहिक रूप से क़त्ल हो जाने की इजाज़त है ? क्या इस्लाम में जो कसास लेने का ज़िक्र अल्लाह सुभान व तआला क़ुरआन मजीद में ज़िक्र कर रहा है। ईरान के न्यूक्लियर साइट फोरदो इस्फहान आदि में बंकर बस्तर बम द्वारा 22 जून 2025 अमेरिका ने हमला किया अगर इसी तरह का हमला ईरानी जनता पर किया जाता है तब क्या ईरान बदला ले सकता है क्या कसास लिया जा सकता है अगर इरादा भी किया जाए बदला लेने का तब भी नहीं कर सकते हैं जानते है क्यों क्योंकि ईरान के पास वैसे परमाणु हथियार हैं ही इसलिए फतवे से असहमति की है ईरान का फतवा इस्लाम के नज़रिए से सही हो सकता है लेकिन अगर इस्लाम के कसास के क़ुरआन मजीद के आदेश को देखा जाए तो यह ताजाजाद कर रहा है ईरान का दुश्मन अमेरिका इंसानियत का दुश्मन भी है और इसने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा चुका है ऐसे में अमेरिका और उसके साथी ...
दीन -ए-हनीफ़
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दीन–ए–हनीफ़ दीन-ए- हनीफ़ के बारे मे कुरान मजीद मे ज़िक्र किया गया है अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने यहूदी और ईसाई मज़हब के आने के बाद उसका ज़िक्र क्यों नहीं किया जबकि यहूदी के यहोवा और ईसाईयों के गॉड एक अल्लाह का ही ज़िक्र करते है मुसलमानों यहूदीयों और ईसाईयों तीनों का यहोवा अल्लाह गॉड एक ही है और हज़रत इब्राहीम के ही वंशज है तीनों फिर भी अल्लाह कुरान मजीद मे दीन हनीफ़ का ज़िक्र किया गया है मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम के पूर्वज या (जद अमजद) भी दीन ए हनीफ़ पर कायम थे। आज चर्चा का विषय या मौजू दीन ए हनीफ़ है । हनीफ़ एक अल्लाह की इबादत करने वाले को कहते है और मूर्ति पूजा और अल्लाह का शरीक से दूर रहना है, हज़रत इब्राहीम ने अल्लाह की इबादत की और मूर्ति पूजा के खिलाफ संघर्ष किया, इसलिए उन्हे हनीफ़ कहा जाता है । दीन-ए –हनीफ़ उन लोगों का दीन है जो अल्लाह की इबादत करते है । अल्लाह की इबादत तो यहूदी भी करते है और अल्लाह की इबादत ईसाई भी करते है लेकिन यहूदी हज़रत उजैर को अल्लाह का बेटा कहते है और ईसाई हज़रत ईसा को अल्लाह का बेटा कहते है इस शिर्क को अल्लाह ने नकारा है और इरशाद फरमाता सूरे इखलास ...
दावत-ए-ज़ुल अशिरा व गदीर -ए- खुम
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दावत-ए-ज़ुल अशिरा व गदीरे खुम कुफ़फार मक्का जब मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम को रसूल उल्लाह नहीं मानते थे तब भी अल्लाह के नबी को सादिक, अमीन और वादे को पूरा करने वाला समझते थे, मानते थे। सूरे अश-शुअरा (सूरे 26 आयत नं. 214) के अनुसार “ और अपने निकटतम सम्बन्धियों को सावधान करो” जब यह आयत नाज़िल हुई, तो अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने एक दावत का आयोजन किया जिसे इतिहास मे दावत ज़ुल अशिरा कहा जाता है । बनी हाशिम (हाशिम के वंशज) से लगभग 40 लोगों को बुलाया गया हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस सलाम ने खाने का प्रबन्ध किया। मेहमानों को खाना- पानी परोसने के बाद जब नबी करीम मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम उनसे इस्लाम के बारे मे बात करना चाहा, तो अबू लहब ने उन्हे रोक दिया और कहा, आपके मेजबान ने आपको बहुत पहले ही जादू कर दिया है । अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम द्वारा उन्हे अपना संदेश देने से पहले सभी मेहमान तितर-बितर हो गये। अगले दिन अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने उन्हे आमंत्रित किया। ...
जन्नतुल बक़ी
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रसूल उल्लाह सल्लालाहों अलैह व आले वसल्लम ने जब ग़दीर में हज़रत अली को मौला का ऐलान किया कि जिसका मौला मैं उसके मौला अली इस ऐलान के बाद नबी करीम को ज़हर दे दिया गया उसके बाद यजीदीयों ने हज़रत अली को मस्जिद में सजदे के दौरान क़त्ल कर दिया यजीदीयों ने हज़रत अली के बेटे इमाम हसन को ज़हर दिलवाकर क़त्ल करा दिया आगे हज़रत अली के बेटे इमाम हुसैन और उनके समस्त परिवार, दोस्त समेत सबको क़त्ल करा दिया 1932 में एक बार फ़िर मुआविया और यजीद की औलाद को अरब की सत्ता ब्रिटिशों के रहमो करम से मिल गई जो सबसे पहला काम मुआविया और यजीद की औलादो और उनके चाहने वालो ने मोहम्मद मुस्तफा सल्लालाहों अलैह व आले मोहम्मद से दुश्मनी को अंजाम देते हुए अल्लाह के नबी की बेटी के मकबरा को ध्वस्त कर दिया सवाल उठता है कि 632 से बना हुआ 1932 तक कायम रहा अब तक वहां इस्लाम नहीं था ऐसा यजीदीयों का मानना है अब यजीदी अल्लाह के नबी के रोजे को तोड़ने की साज़िश भी यजीदी रचते आ रहे है रसूल उल्लाह सल्लालाहों अलैह व आले वसल्लम ने जब ग़दीर में हज़रत अली को मौला का ऐलान किया कि जिसका मौला मैं उसके मौला अली इस ऐलान के बाद नबी करीम को ज़हर दे दि...
मुस्लिम भारत संघ में और उन पर उठने वाले सवाल
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ऐसा बहुत सारे लोगों से सुना होगा कि पाकिस्तान चले जाओ सऊदी चले जाओ एक समाजवादी पार्टी के नेता है जो यह कहते हैं कि हम पाकिस्तान जा सकते थे मगर हमने भारत को चुना यह सारी बातें एक मूर्ख व्यक्ति और अज्ञानी व्यक्ति कर सकता है फिर अक्लमंद इंसान दानिशमंद इंसान की प्रतिक्रिया क्या होगी पाकिस्तान बनने के बाद भारत में बहुत मुस्लिम रियासत थी जैसे भोपाल रियासत, रामपुर, निज़ाम हैदराबाद, महमूदाबाद, जूनागढ़ आदि रियासत जब यूनियन ऑफ इंडिया में मिलाया गया तो उसके साथ उनकी हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध प्रजा को भी भारत संघ में मिलाया गया जैसे जम्मू और कश्मीर हिंदू राजा के अधीन होने के बाद मुस्लिम वहां बहुमत से है अब यह कोई कहे कि मुसलमान को पाकिस्तान जाना चाहिए तो उन्हें इस बात को बता देना कि मुसलमान का भारत में होना पाकिस्तान के बनने से नहीं हैं बल्कि प्रिंसिली स्टेट में पहले से होने और भारत संघ में उनके अस्तित्व के साथ स्वीकार किया गया था
आर एस एस के सदस्य
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आर एस एस के सदस्य चोर डाकू अपराधी से लेकर जज पुलिस कमिश्नर मंत्री मुख्य मंत्री प्रधान मंत्री गृह मंत्री स्पीकर सेना के अधिकारी और जवान हो सकते संस्था का पंजीकरण नहीं है और सदस्यों का कोई रजिस्टर नहीं है ऐसे में किसी अपराधी सदस्य को आसानी से कहा जा सकता है कि यह आर एस एस का सदस्य नहीं है इसके सदस्य आला से आला ओहदे पर पहुंचने के बाद और संविधान की शपथ लेने के बाद उसके खिलाफ काम करते हैं और अपने संस्था के प्रति वफादार रहते हैं यह भारत का डीप स्टेट है इसको प्रतिबंधित करने की स्थान पर इसमें प्रधान मंत्री से लेकर मुख्य मंत्री और अन्य सदस्य हिस्सा लेते है
आर एस एस
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आर एस एस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) जो गैर पंजीकृत गैर कानूनी संस्था हैं जिसको भारतीय मीडिया उनके प्रवक्ता को मंच पर बुला रहे हैं इंटरव्यू दे रहे हैं सरकार को मशविरे दे रहे सरकार में दखल भी रखते है अब आर एस एस के लोग पड़ोसी देशों में भी पहुंच चुके हैं और वहां भी हिंसा में भूमिका निभा रहे हैं और भारत के पड़ोसी देशों को अस्थिर करने में लगे हैं यह अस्थिरता इस लिए फैला रहे है ताकि अखंड भारत के अन्दर पाकिस्तान अफगानिस्तान बांग्लादेश नेपाल आदि को अपने अधीन करना और हिन्दुत्व के अधीन लाना है, भारत में भी लोग हिंसा का आरोप अल्पसंख्यकों पर लगाते रहे हैं जबकि हिंसा करने में आर एस एस के लोग महारत हासिल है और गैर भाजपा सरकारों को बदनाम करने में मुख्य भूमिका निभाते रहे हैं अब तक कोई भी विपक्षी पार्टी आर एस एस के खिलाफ मुंह नहीं खोलती है और न उसके गैर कानूनी होने पर कोई सवाल उठाते हैं और न कोई आपत्ति करते हैं यह सरकार के भीतर सरकार है
हिंसा और हथियार
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हिंसा और हथियार से बदलाव नहीं आ सकता..... अमित शाह क्या उनकी इस बात से सहमत हुआ जा सकता है हम लोग इस बात से सहमत नहीं है हिंसा और हथियार से ही बदलाव अमित शाह भी ला रहे है बस अन्तर यह है कि जिन को मिटाया जा रहा है उनकी संख्या और हथियार कम है जो मिटा रहे हैं उनकी संख्या हथियार संसाधन पर्याप्त है इस लिए यह कहना बिल्कुल गलत है कि हिंसा और हथियार से बदलाव नहीं लाया जा सकता पूर्व में बहुत से उदाहरण है जैसे बाबर के पास उन्नत तोप ने जंग के नक्शे को बदल दिया, अंग्रेजों के आधुनिक हथियार, जापान पर परमाणु हथियार गिराना अफगानिस्तान इराक सीरिया और लीबिया को हिंसा और हथियारों के द्वारा लूटा गया इसलिए हम लोग अमित शाह के बयान से सहमत नहीं हैं
भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित है... अमित शाह
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भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित है.... अमित शाह उनकी इस बात से हम लोग सहमत नहीं है अल्पसंख्यक में जो गिने जाते है 1. बौद्ध 2. जैन 3. पारसी 4. मुस्लिम 5. ईसाई 6. सिख है इसमें बौद्ध पारसी जैन तो अपने को सुरक्षित कह सकते है मगर मुस्लिम और ईसाई सुरक्षित नहीं है और विशेषकर मुसलमानों के खिलाफ तो पूरा सिस्टम ही दुश्मन जैसा व्यवहार कर रहा है 1. मस्जिद और मज़ार तोड़े जा रहे हैं नमाज़ सड़क पर पढ़ने या छत पर पढ़ने पर पासपोर्ट और लाइसेंस रद्द करने की धमकी 2. मुस्लिमों के घर को बिना नक्शे का बताकर तोड़ना वैसा हिंदूओ के साथ न करना 3. मुस्लिमों को नजरबंद करना 4. मॉब lynching में अब तक सैकड़ों मुस्लिमों का कत्ल किया जाना 5. मुस्लिमों का नरसंहार करना हाशिमपुरा, भागलपुर, गुजरात muzzafarnagar और न जाने कितने नरसंहार जो सरकार की मंशा के अनुसार या सरकार के संरक्षण में मुस्लिम नरसंहार हुए इन कारणों से हम लोग सहमत नहीं है अमित शाह के बयान से कि भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित है
दुआ ए मुजीर
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*दुआ ए मुजीर हिन्दी मे* बिस्मिल्लाह अर्रहमान निर्रहीम सुब्हानका या अल्लाहो, ताआलैता या रहमानो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या रहीमो, ताआलैता या करीमो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या मालेको, ताआलैता या मालेको, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या क़ुद्दूसो, ताआलैता या सलामो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या मोमिनो, ताआलैता या मोहैमेनो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या अज़ीज़ो, ताआलैता या जब्बारो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या मुतकब्बेरो, ताआलैता या मुतजब्बिरो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या ख़ालिको, ताआलैता या बारेओ, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या मुसव्विरो, ताआलैता या मुक़द्दिरो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या हादी, ताआलैता या बाक़ी, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या वहाबो, ताआलैता या तव्वाबो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या फ़त्ताहो, ताआलैता या मुरताहो, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या सय्यिदी, ताआलैता या मौलाया, अजिरना मिनन नारे या मुजीर सुब्हानका या क़रीबो, ताआलैता या रक़ीबो, अजिरन...
भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर होने वाले अपराध crime against SC/ST in India
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