Ahmad Rizvi

कुफ़्र व मुनाफ़कत

 अल्लाह सुभान व तआला का इंकार करने वाला काफ़िर है लेकिन अल्लाह सुभान व तआला को मानता हो और इसके बाद भी काफ़िर हो इसकी कोई दलील है इब्लीस  अल्लाह को मानता है उसको सज्दा करता है लेकिन हज़रत आदम को सज्दा करने के अल्लाह के हुक़्म का इंकार करना इब्लीस को काफ़िर बनाता है | अब जो अल्लाह सुभान व तआला के हुक़्म फ़ैस्ले तकर्रूरी पर सहमत न हो वो काफ़िर है | एक और इन्सान भी है जो न मुस्लिम है और न काफ़िर है दो नम्बरी है, का ज़िक्र है वो मुनाफ़िक़ है |इस मुनाफ़िक़ के बारे मे यह है कि अल्लाह सुभान व तआला को मानता है रसूल उल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की रिसालत का इक़रार भी करता है मगर दिल से रसूल की गवाही नही देता है उसे मुनाफ़िक़ करार दिया गया है | आज कल लोग बड़े फ़ख्र से कहते है कि हम सेकुलर है जिसका मतलब ही मुनाफ़िक़ है |

इस्लाम मे माता -पिता का हक़

इस्लाम मे माता पिता के हक के बारे मे बताया गया है कि अगर माँ बाप (वालदैन) जालिम भी हो और तुम पर ज़ुल्म भी करे तो तुम “उफ़ “ भी न कहो । अगर तुम्हारे माँ बाप काफिर हो और तुम्हें कोई हुक्म दे तो उसे बजा लाओ (यानी पूरा करो ) सिर्फ इस्लाम को छोड़ने की बात की पैरवी न करो । माँ बाप की जरूरतों को उनके कहने से पहले पूरा कर दो । माँ बाप की नाराज़गी मे तुम्हारी जहन्नम है । क्या माँ बाप का हक अदा किया जा सकता है ? माँ बाप का हक़ किसी भी कीमत पर अदा नहीं किया जा सकता है ।

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