Ahmad Rizvi

हिज़बुल्लाह इस्राइल और आतंक

इस्राइल : जर्मनी और दुनियाभर से लाये गये यहूदीयों को फ़िलिस्तीन मे लाया गया अमेरिका ब्रिटेन फ़्रान्स रुस आदि देशो ने यहूदीयों को हथियार दिया जिससे फ़िलिस्तीनीयों का क़त्ले आम किया गया और आतंक के बल पर इस्राइल देश को बनाया गया जिसका संरक्षण वीटो ताक़त वाले देश अमेरिका ब्रिटेन फ़्रान्स और रुस करते रहे हैं यहां विशेष बात यह है कि इस्राइल आतंकवादी से एक देश बन गया और अब इस्राइल का आतंक एक देश के कानूनी जामा पहने हुवे हो गया | अब जब अन्य देश आतंकवाद के खिलाफ़ बोलते हैं तो वो फ़िलिस्तीन द्वारा की गई हिंसा के खिलाफ़ बोलते है लेकिन इस्राइल के बड़े से बड़े आतंक पर चुप्पी बनाये रहते हैं कारण राज्य के द्वारा किया गया कार्य कानूनी सम्मत समझा जा रहा है | सिरिया : सिरिया के मोहम्मद अल जोलानी का उदाहरण लेते है जो अमेरिका के निगाह मे घोषित ईनामी आतंकवादी थे कब तक थे?  जब तक उनके हाथ मे सत्ता नही आ गई और अमेरिका और इस्राइल के हितो मे काम नही करने लगे जैसे ही अमेरिका और इस्राइल के लिये काम करने लगे वो मोहम्मद अल जोलानी आतंकवादी से प्रेसीडेन्ट अहमद अल शरा बन गये | यहाँ यह लिखने का मुख्य उद्देश्य यह है कि ह...

दावत-ए-ज़ुल अशिरा व गदीर -ए- खुम

दावत-ए-ज़ुल अशिरा व गदीरे खुम कुफ़फार मक्का जब मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम को रसूल उल्लाह नहीं मानते थे तब भी अल्लाह के नबी को सादिक, अमीन और वादे को पूरा करने वाला समझते थे, मानते थे। सूरे अश-शुअरा (सूरे 26 आयत नं. 214) के अनुसार “ और अपने निकटतम सम्बन्धियों को सावधान करो” जब यह आयत नाज़िल हुई, तो अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने एक दावत का आयोजन किया जिसे इतिहास मे दावत ज़ुल अशिरा कहा जाता है । बनी हाशिम (हाशिम के वंशज) से लगभग 40 लोगों को बुलाया गया हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस सलाम ने खाने का प्रबन्ध किया। मेहमानों को खाना- पानी परोसने के बाद जब नबी करीम मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम उनसे इस्लाम के बारे मे बात करना चाहा, तो अबू लहब ने उन्हे रोक दिया और कहा, आपके मेजबान ने आपको बहुत पहले ही जादू कर दिया है । अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम द्वारा उन्हे अपना संदेश देने से पहले सभी मेहमान तितर-बितर हो गये। अगले दिन अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने उन्हे आमंत्रित किया। दावत के बाद, मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने उनसे कहा: “ ऐ अब्दुल मुत्तलिब की औलादों ! अल्लाह की कसम, मै अरबों मे से किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता जो अपनी कौम के पास उससे बेहतर लेकर आया हो जो मै तुम्हारे पास लाया हूँ। मै तुम्हारे लिए इस दुनिया और आखरत की भलाई लेकर आया हूँ, और मुझे रब ने हुक्म दिया है कि मै तुम्हें अपनी ओर बुलाऊँ। तो तुममे से कौन इस मामले मे मेरा साथ देगा ताकि वह मेरा भाई (अखी) मेरा उत्तराधिकारी (मेरा वसी) और तुममे से मेरा खलीफा बन सके। अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने अपनी रिसालत की गवाही देने वाले को “ अखी वसीयी व खलीफ़ती” होने का ऐलान किया । किसी ने भी उनका जवाब नहीं दिया । अली इब्ने अबी तालिब ने रिसालत की गवाही सबसे पहले और तीन बार दिया। अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने अपना हाथ अली की गर्दन पर रखा और कहा “इन्ना हाज़ा अखी व वसीयी व खलीफ़ती फ़िकूम, फसमाऊ लहू व अतीऊ अनुवाद वास्तव मे यह मेरा भाई, मेरा उत्तराधिकारी और तुम्हारे बीच मेरा खलीफा है; इसलिए, उसकी बात सुनो और उसका पालन करो । “ इस पर अबू लहब ने अबी तालिब से मज़ाक किया कि आपके भतीजे ने आपको अपने बेटे की बात सुनने और उसका पालन करने का आदेश दिया है । मक्का की फतह 11 जनवरी 630 ईस्वी 20 रमजान 08 हिजरी को हुई थी । गदीर-ए-खुम – 16 मार्च 632 ईस्वी 18 ज़िलहिज़्जा 10 हिजरी को हुआ । अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम का विसाल 8 जून 632 को हुआ । गदीरे-ए-खुम अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम का आखरी हज को करने के बाद, वापसी पर गदीर नामक जगह मैदान मे खुतबा दिया गया जिसमे अल्लाह के नबी ने तमाम और नसीहतों के साथ “हज़रत अली “ को बलन्द करके “मन कुनतों मौला फ़हाज़ा अलीयुन मौला” मै जिसका मौला हूँ उसके यह अली मौला है” दावते ज़ुलअशिरा मे अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने इरशाद फरमाया “इन्ना हाज़ा अखी व वसीयी व खलीफ़ती फिकुम, फसमाऊ लहु व अतीऊ “ अनुवाद वास्तव मे यह मेरा भाई, मेरा उत्तराधिकारी और तुम्हारे बीच मेरा खलीफा है; इसलिए, उसकी बात सुनो और उसका पालन करो । “ गदीर खुम मे जो नबी ने ऐलान किया वो ऐलान दावते ज़ुलअशिरा मे किया गया ऐलान ही है । सादिक़ नबी और अपने वादे को निभाने वाले नबी ने अपने फराएज़ को अंजाम दिया । दुश्मन रसूल उल्लाह ने अल्लाह के नबी पर ही आरोप लगा दिया कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी किसी को नहीं बनाया । इससे दूसरी क़ौमों मे यह पैगाम गया कि जिस नबी ने उठने बैठने खाने पीने चलने आदि का अदब सिखाया, जिसने पानी पीने का तरीका सीखाया, तमाम उलूम और अदब और दिन सीखाया उस नबी करीम मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया, इसका मतलब यह हुआ कि दीन अपूर्ण है जबकि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फरमाता है कि ऐ नबी मैंने आज तुम्हारे दीन को मुकम्मल (पूर्ण) कर दिया जो मुकम्मल हो वो गैर मुकम्मल कैसे हो सकती है । इसलिए आज भी शिया और सुन्नी दोनों की किताबों मे गदीर के ऐलान और मन कुनतों मौला फहाज़ा अलीयुन मौला “ का जिक्र (उल्लेख) है । अब आप अली को मौला माने या न माने मगर अल्लाह के नबी मोहम्मद मुस्तफा सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम पर आरोप न लगाए कि आपने अपना उत्तराधिकारी, जानशीन, खलीफा घोषित नहीं किया ।

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