हस्बुनाह किताबउल्लाह
हस्बुनाह किताबउल्लाह
अल्लाह के नबी रहमतुल आलमीन सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम का इरशाद है “ इन्नी तायरतुन फ़ीस सक़लैन किताबउल्लाह और इतरती” मै दो वज़नी चीज़े छोड़ जाता हूँ अल्लाह की किताब और इतरत अगर इन दोनों को थामे रहोगे तो गुमराह नहीं होगे,
मगर उस दौर में भी ऐसे व्यक्ति थे जो रिसालत माब सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की मुखालफत करने की ज़ुर्रत रखते थे और उन्होंने मुखालफत की जबकि अल्लाह के नबी सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की एताअत वाजिब है
जिसने भी यह कहा है “हस्बुनाह किताबउल्लाह” मेरे लिए अल्लाह की किताब काफी है , क्या यह कहना दुरूस्त है जबकि रसूलउल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम ने अल्लाह की किताब “कुरान मजीद “ और अपनी इतरत को थामने या मज़बूती से पकड़ने का हुक्म दिया है
आगे देखते है कि हस्बुन्नाह किताबउल्लाह क्या किताब अल्लाह को बगैर इतरत के समझा जा सकता है अगर हाँ , तो कितना , अगर नहीं तो कितना ?
अलिफ़ लाम मीम (सुरे बकरा, सुरे आले इमरान) अलिफ़ लाम मीम स्वाद (सुरे आराफ़) अलिफ़ लाम रा (सुरे युनुस, हूद, इब्राहीम, हज्र) काफ हा या ऐन स्वाद (सूरे मरियम) ताहा (सूरे ताहा ) ता सीन मीम (सूरे शोरा) ता सीन (सूरे नम्ल) ता सीन मीम (सूरे क़सस) अलीफ लाम मीम (सूरे अनकबूत, सूरे रूम, सूरे लुकमान, सूरे सजदा), यासीन (सूरे यासीन) स्वाद (सूरे स्वाद), हा मीम (सूरे गाफिर) हामीम सजदा (सूरे हामीम सजदा ), हा मीम ऐन सीन क़ाफ़ (सूरे शोरी ) हा मीम (सूरे ज़खरफ), हा मीम (सूरे दखान, सूरे अह्काफ) क़ाफ़ (सूरे क़ाफ़) नून व कलम (सूरे कलम)
कुरान मजीद में अलिफ़ लाम मीम अल्लाह मोहम्मद सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम है या आले मोहम्मद सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम है, क़ाफ़ क़यामत है या कायम है इसको बतायेगा कौन ? आईये कुरान मजीद से पूछते है सूरे राद आयत संख्या 19 का तर्जुमा “क्या वो शख्स जो यह जानता है कि जो कुछ आपके रब की तरफ से नाज़िल हुवा सब बरहक है वो उसके जैसा हो सकता है जो बिलकुल अँधा है इस बात को सिर्फ साहिबाने अक्ल ही समझ सकते है “
इस आयत में अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने उस शख्स का ज़िक्र किया है जो रसूलउल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम पर नाज़िल किया गया है सब सच्चा है अब उस शख्स के लिए भी बताया गया है जो अल्लाह की निगाह में बिलकुल अँधा है “
पहली बात मोहम्मद मुसतफा सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की रिसालत का इकरार करने वाले को यह ज़ेबा ही नहीं देता कि रसूल उल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम किसी दो ग्रां (वज़नी) चीज़ को बताये और आप कहे कि ठीक है 50 प्रतिशत आपकी मानता हूँ और 50 प्रतिशत छोड़ देता हूँ मेरी मर्जी /
अब जिसने यह कहा कि मेरे लिए किताब अल्लाह काफी है क्या उनके लिए किताब अल्लाह काफी रही या नहीं या रसूल उल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम ने किताब अल्लाह और इतरती कहा और ऐसा मानना ही पड़ा
आइये इसको देखते है जब इन्साफ करने में नाकाम हुवे और मौला अली ने न्याय को कायम किया तब कहना पड़ा “ अगर अली न होते तो हम हलाक हो जाते “ इस जुमले से ही पता चलता है कि वो कितना नादिम है अपनी नाइल्मी पर
और रसूलउल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की
ना फ़रमानी पर , आखिर मानना तो पड़ा ही रिसालत माब को ही किताब उल्लाह और इतरती उसके
बगैर यह कहने को मजबूर होना पडा कि अगर अली न होते तो हलाक हो जाता “
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