Ahmad Rizvi

शाह नेअमत उल्लाह वली की भविष्य वाणी

 शाह नेअमत उल्लाह वली जो सातवें इमाम मूसा काज़िम सलातो वस सलाम की नस्ल से है जिनका ताल्लुक ईरान से है उन्होंने आने वाले हालात के बारे में लगभग 800 साल पहले बता दिया था और आपकी सभी भविष्य वाणी अक्षरश: सही साबित हुई आपने 800 साल पहले चींटियों और टिड्डियों से हमले के बारे में बताया था चींटी और टिड्डी दोनों झुंड में हमला करती है दूसरी बात 800 सालों में ऐसी कोई ईजाद नहीं हुई जो अब हो चुकी है अब छोटे छोटे रोबोट और ड्रोन आ गए अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने कितना पहले लोगो को बता दिया और जिन चीज़ों का वजूद भी नहीं उनके बारे में भी बताया दिया गौर करने की ज़रूरत है

इस्लाम मे यज़ीदीयों की भूमिका

इस्लाम दीन अल्लाह का अता किया हुआ दीन है सबसे बड़ी चीज इस्लाम मे कोई है तो वो है “अदल “ । इस्लाम नाइंसाफी को पसन्द नहीं करता है अल्लाह को कोई मानता हो या न मानता हो फिर भी इस्लाम उसकी जान माल की हिफ़ाज़त/ सुरक्षा को प्राथमिकता/ तरजीह देता है । अब इस्लाम को बदनाम करने, आतंक करने, इस्लाम के सिद्धांतों/उसूलों की मुखालफत करने वाला गिरोह कब मज़बूत हुआ । अल्लाह और अल्लाह के नबी पाक की मुखालफत कहाँ से शुरू हुई । शुरुआत से ही नबी पाक की मुखालफत होती रही है यह मुखालफत इस्लाम का हिस्सा कैसे बन गई और आज मुस्लिमों को क्यों ज़िल्लत उठानी पड रही है । बनी उमईया जो अल्लाह और अल्लाह के नबी का विरोध करते थे ने जब से इस्लाम को अपनाया और इस्लाम के उसूलों के खिलाफ काम करना शुरू किया तब से आज तक इस्लाम के उस हिस्से मे खराबी ही खराबी पैदा है जिस हिस्से मे बनी उमैया को हीरो की तरह माना जाता है । उतबा मुआविया का नाना है , और जीगरचबाने वाली हिन्दा का बाप है इसकी बदकिरदारी को इतिहास मे पढ़ सकते है । अबू सूफियान और मुआविया जिनके द्वारा हमेशा नबी पाक की मुखालफत करते रहे है मक्का फतेह के बाद (जो 20 रमज़ान 8 हिजरी बमुताबिक 11 जनवरी 630 ईस्वी ) को हुई थी । उसमे अबूसूफियान और मुआविया अपनी जान बचाने के इरादे से और पनाह लेने के लिए इस्लाम मे दाखिल हुए । 8 जून 632 को पैगंबरे इस्लाम की वफ़ात हो गई । इस दौरान 2 वर्ष 5 माह 27 दिन होते है । जंगे उहद मे मुआविया की माँ हिन्दा ने अल्लाह के नबी के चचा हज़रत हमज़ा की शहादत के बाद उनके जीगर को चबाया और जिस्म के टुकड़े को गले की माला बनाकर पहना था । इस कारनामे को अंजाम दिया था कुफ्र की हालत मे तब हिन्दा मुआविया अबूसूफियान काफिर थे लेकिन इनकी नस्ल मे कभी इंसानियत पनपी ही नहीं अगर एक दो अपवाद को छोड़ दे । सिफ़फीन की जंग मे जब नहरे फरात पर मुआविया बागी के फौज ने कब्जा कर लिया तो मुआविया बागी के हुक्म पर अमीरूल मोमिनीन की फौज पर पानी बंद कर दिया । लेकिन अमीरूल मोमिनीन के हाथों मे जब उसी फरात नहर पर क़ब्ज़ा किया गया तो आप बेहतरीन इंसानियत को तकमील तक पहुंचाते हुए पानी को किसी पर बंद नहीं किया सब को लेने का हक दिया गया यहाँ तक कि मुआविया बागी और उसके बागी गिरोह तक को इजाज़त दी गई । इसके बाद कर्बला मे रसूल के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथी रिश्तेदार बच्चों को प्यासा कत्ल करने के बाद उनकी लाशों पर घोड़े दौड़ाया जाना सरो को बलम की नोक पर उठाना ऐसा अपमानजनक सुलूक लाशों के साथ किया जाना जिसका इस्लाम मे कोई नज़ीर नहीं मिलती है नज़ीर अगर मिलती है तो काफिर हिन्दा के रूप मे उतबा के रूप मे । अब सवाल पैदा होता है कि अल्लाह के नबी और उनके वसी हज़रत अली जंगे बद्र उहद खैबर खंदक आदि जंगों मे नेत्रत्व किया क्या किसी लाश के साथ ऐसी कोई नाज़ेबा हरकत की या करने की इजाज़त दी । जवाब – नहीं ऐसा किरदार तो पूरे इस्लाम मे कभी नहीं सिखाया गया । लेकिन यज़ीदीयों (जो बुतपरस्त थे और इस्लाम और पैगंबर के विरोधी थे ) ने अपने कारनामों से इस्लाम के उसूलों को पलटने की कोशिश की । अल्लाह और अल्लाह के नबी की मुखालफत का नतीजा यह निकला कि दूसरी कौमे भी यज़ीदीयों पर थूकने से भर्त्सना करने से नहीं हिचकती है । यज़ीदीयों का इस्लाम और पैगंबर के उसूलों से कोई लेना देना नहीं है । लेकिन दुनियाभर मे जब भी लाशों की बेहुरमती करने वाली कौम को देखते है । एक यज़ीदी कौम के लोग है और दूसरे यहूदी कौम के लोग है , दोनों का चरित्र एक तरह का है । इस्लाम का हैवानियत बर्बरीयत , ज़ुल्म नाइंसाफी से कोई संबंध नहीं है मगर यज़ीदीयत का इनसे सम्बन्ध है और यज़ीदीयों ने अपने को इस्लाम मे शुमार किया हुआ है । इस्लाम जो अल्लाह के नबी और उसके वसी और मोहम्मद सलल्लाहों अलैह व आले वसल्लम की आल पाक ने फैलाया है उस इस्लाम मे ज़र्रा बराबर भी कमी नहीं है । इस्लाम मे जो दो फाड़ हमेशा से रहा है उस दो फाड़ मे खाई तब बन गई जब कर्बला मे नवासे रसूल और उनके खानदान साथियों को कत्ल किया गया जिसके बाद इस्लाम और यज़ीदीयत मे स्पष्ट अंतर है हर हुसैनी इस्लामी है और हर यज़ीदी दुश्मने इस्लाम है यह लकीर कयामत तक खींची हुई है । कलमा नबी का यज़ीदी भी पढ़ रहे थे मगर वो हुसैन के साथ नहीं थे वो नबी के साथ नहीं थे वो नबी की एताअत करने के बजाय उसका विरोध करने पर अड़े थे वो अल्लाह की मुखालफत करने पर अड़े थे वो नबी के उसूलों की मुखालफत कर रहे थे और आज भी कर रहे है , यज़ीदी कुरान की आयत जिसमे आले मोहम्मद से मोअददत करने का हुक्म दिया गया है उसकी मुखालफत कर रहे थे । आज भी जो अपने को इस्लाम के साथ जोड़ता है और यज़ीद की पैरवी करता है, उसके प्रति नरम दिल रखता है वो सब यज़ीदी है और उनका रिश्ता न रसूल से है न इस्लाम से है न कुरान से है ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दावत-ए-ज़ुल अशिरा व गदीर -ए- खुम

इंजील मे इमाम हुसैन का ज़िक्र

गोग और मगोग (याजूज और माजूज)