Ahmad Rizvi

हस्बुनाह किताबउल्लाह

अल्लाह के नबी रहमतुल आलमीन सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम का इरशाद है “ इन्नी तायरतुन फ़ीस सक़लैन किताबउल्लाह और इतरती” मै दो वज़नी चीज़े छोड़ जाता हूँ अल्लाह की किताब और इतरत अगर इन दोनों को थामे रहोगे तो गुमराह नहीं होगे, मगर उस दौर में भी ऐसे व्यक्ति थे जो रिसालत माब सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की मुखालफत करने की ज़ुर्रत रखते थे और उन्होंने मुखालफत की जबकि अल्लाह के नबी सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की एताअत वाजिब है जिसने भी यह कहा है “हस्बुनाह किताबउल्लाह” मेरे लिए अल्लाह की किताब काफी है , क्या यह कहना दुरूस्त है जबकि रसूलउल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम ने अल्लाह की किताब “कुरान मजीद “ और अपनी इतरत को थामने या मज़बूती से पकड़ने का हुक्म दिया है आगे देखते है कि हस्बुन्नाह किताबउल्लाह क्या किताब अल्लाह को बगैर इतरत के समझा जा सकता है अगर हाँ , तो कितना , अगर नहीं तो कितना ? अलिफ़ लाम मीम (सुरे बकरा, सुरे आले इमरान) अलिफ़ लाम मीम स्वाद (सुरे आराफ़) अलिफ़ लाम रा (सुरे युनुस, हूद, इब्राहीम, हज्र) काफ हा या   ऐन स्वाद (सूरे मरियम) ताहा (सूरे ताहा ) ता सीन मीम (सूरे शोरा) ता सीन (सूरे नम्ल) त...

विदअत

विदअत क्या है इस्लाम मे विदअत ऐसे कार्य को करना है जो हुक्म अल्लाह ज़ुलजलाल वल इकराम व रसूल उल्लाह मोहम्मद मुस्तफा अहमद मुजतबा सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने न किया हो । अज्ञानी मौलवी ने “रोने को विदअत “ कहना शुरू कर दिया वो इसलिए कि आले मोहम्मद सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम इमाम हुसैन और उनके कराबतदारों, मेहमानों, और दोस्तों को कर्बला मोअल्ला मे शहीद कर दिया गया । आले मोहम्मद सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम से मोअददत करने वाले लोग अपनी मोअददत मे उन पर होंने वाले ज़ुल्म पर रोते है । मुआविया और यज़ीद लानत उल्लाह अलैह से लगाव रखने वाले और उनसे मोहब्बत करने वाले, हुसैनियों से नफरत करते है और रोने को विदअत कहते है । “रोने को विदअत “ कहने वाले उस वक्त खामोश हो गये जब हज़रत आदम के रोने का ज़िक्र आया, जब हज़रत याकूब के रोने का ज़िक्र आया, और अल्लाह ज़ुलजलाल वल इकराम के नबी मोहम्मद मुस्तफा अहमद मुजतबा सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम के रोने का ज़िक्र आया वह भी तब जब हज़रत हमज़ा की शहादत हुई और कर्बला मे अपने नवासे इमाम हुसैन की होने वाली शहादत का पहले से बता देना और गिरया (रोना) करना साबित कर रहा था कि रोना विदअत नहीं बल्कि रोना “सुन्नत-ए-नबीइन” (बहुत सारे नबीयों की सुन्नत)है । विदअत अब तक कहाँ कहाँ हुआ है इसको बताने की कलील (छोटी) कोशिश (प्रयास) करता हूँ। विदअत: 1. जिस बेटी की ताज़ीम करने के लिए अल्लाह ज़ुलजलाल वल इकराम व रसूल उल्लाह मोहम्मद मुस्तफा अहमद मुजतबा सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम खड़े हो जाते थे और उस बेटी के घर पर सलाम पढ़ते थे बाद वफ़ात नबी सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम उसके घर पर हमला कर दिया जाए उसके घर को आग लगा दी जाए उसको शदीद ज़ख्मी कर दिया गया यह है विदअत । 2. अल्लाह ज़ुलजलाल वल इकराम के रसूल उल्लाह मोहम्मद मुस्तफा अहमद मुजतबा सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने अपनी बेटी को बाग अता किया उस बाग को बाद वफ़ात नबी क़ब्ज़ा कर लिया गया यह है विदअत 3. अल्लाह ज़ुलजलाल वल इकराम के रसूल उल्लाह मोहम्मद मुस्तफा अहमद मुजतबा सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने गदीर-ए-खुम मे हज़रत अली को मौला घोषित किया और सहाबियों और तमाम अफराद (व्यक्ति ) जो लाखों की संख्या मे थे उन्होंने दस्ते अली पर बैअत की अब बाद वफ़ात रसूल उल्लाह मौला के गले मे रस्सी से बांधना उससे ज़बरदस्ती बैअत की मांग करना मुखालिफाते अल्लाह और नबी किया गया जो मरज़ी-ए-इलाही के खिलाफ था यह विदअत की गई । 4. जब अल्लाह सुभान व तआला ने दीन को मुकम्मल कर दिया और जिस नमाज़ को अल्लाह के नबी ने कभी अदा नहीं की उसको प्रचलन मे लाना विदअत है और इसे उलेमा विदअत-ए-हुस्ना कहते है । 5. जिस तरह तलाक का हुक्म “क़ुरान मजीद “ मे दिया गया है उस तरह को छोड़कर किसी अन्य तरीके से तलाक को देना विदअत है । 6. सहाबी का सम्मान करने का दम भरने वाले क़ुरान मजीद की आयतों के पढ़ने पर उसे शहर से निकाल देना इस नई परम्परा का शुरू करना विदअत था । 7. अल्लाह सुभान व तआला के नबी मोहम्मद मुस्तफा अहमद मुजतबा सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम ने जिन बदबख्तों मरवान बिन हकम और हकम बिन आस को मदीने से बदर किया, उसको अपना खास ओहदेदार बनाकर नबी मोहम्मद मुस्तफा अहमद मुजतबा सललल्लाहों अलैह व आले वसल्लम की मुखालफत की गई और मुसलमानों के बैतुल माल से ऐसे बदबख्तों की किफालत की गई और उन्हे शरमायादार बनाया गया यह विदअत था । 8. कूफआ (इराक का एक शहर) पर वलीद इब्ने उकबा जिसने शराब के नशे मे चूर होकर फ़जिर की दो रकात के बजाए 4 रकात पढ़ा दी और लोगों से पूछा क्या और पढ़ा दूँ यह है दीन मे विदअत । 9. जुमा की नमाज़ को बुध को पढ़ा देना यह है विदअत । अभी तक जो लोग विदअत नहीं जानते थे उन्हे गुमराह किया जाता रहा है कि रोना विदअत आदि विदअत बताते नहीं थकते मगर शराब पीकर दो रकात की जगह चार रकात कर देना अल्लाह के नबी की खुल्लम खुल्ला मुखालफत की गई । जुमा की नमाज़ बुध को पढ़ा देना नई नमाज़ ईजाद कर देना जिसका अल्लाह और उसके नबी ने हुक्म ही न दिया हो यह सब विदअत किया गया और किया जा रहा है। विदअतीयों ने इस पर फोकस न करके इससे ध्यान भटकाने के लिए रोने को विदअत कहने लगे जो कि सुन्नत-ए-नबवी है।

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