Ahmad Rizvi

भूकम्प (ज़लज़ला)

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               भूकम्प (ज़लज़ला) सूरे ज़िलज़लाह  आयत संख्या 1 “ इज़ा ज़ुलज़लाती अर्ज़ ज़िलज़लाह ” जब ज़मीन ज़ोरों से हिला दी जाएगी । कुरान मजीद हर दौर (सब ज़माने/ वक़्त/ युग ) के लिए है भूकम्प या ज़लज़ला के बारे मे जैसा कुरान हकीम मे उल्लेख किया गया है वैसा कहीं और नहीं है पिछले दौर मे भूकम्प आए होंगे हाल मे भी भूकंप आते है और आने वाले समय मे भी भूकम्प आएंगे लेकिन जिस दौर के भूकम्प का जिक्र किया जा रहा है उस के बारे मे आगे आयत बता रही है कि ज़मीन खज़ाने (लफ़्ज़ अखरज़ात का जिक्र किया जिसका अर्थ है खर्च होने वाली चीजे का निकलना जैसे कोयला गैस पेट्रोल डीज़ल सोना कोबाल्ट आदि) उगल देगी । उस वक़्त के ज़मीन के ज़ोरों से हिला देने का जिक्र किया गया है । ज़मीन के हिलाने का ज़िक्र जो किया गया है उसमे यह नहीं कहा गया है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के हुक्म से भूकम्प आएगा मलाएका या जिन्न  के कारण आएगा या आदमी के द्वारा बनाए गये असलहे के कारण होगी इन सब से भूकम्प या जलजला आ सकता है लेकिन सच्ची किताब ने आने वाले वक़्त मे जो जिक्र किया है उसे आज की दुनिया मे समझा जा सकता है पहले के...

कुर्बानी

कुर्बानी :  एक मित्र ने लिखा क्या कुर्बानी किसी जानवर की देनी जरूरी है दर्द होता है सभी को 

1. क्या सब्जी की कुर्बानी नहीं दी  जा सकती है ? 

पहले सवाल का जवाब किसी जानवर की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है इसमे कुछ शर्ते  है और हलाल जानवर की कुर्बानी दी जा सकती है ऊंट बकरा भैंसा  आदि पर कुर्बानी दी जा सकती है । 

दूसरी बात दूसरे धर्म के लोग मुसलमानों  को निशाना बनाने के लिए ही ऐसी बात करते है । 

1. पशुपति नाथ मंदिर मे बलि  दी जाती है तो वहाँ पर जानवर कटने  पर दर्द नहीं होता । 

2. कामाख्या देवी मंदिर (आसाम ) मे दी जाने वाली बलि  मे दर्द नहीं होता । 

3. तपेश्वरी देवी मंदिर मे  दी जाने वाली बलि  मे क्या दर्द नहीं होता क्या यहाँ पर महिष की बलि  के स्थान पर सब्जी के रूप मे महिष बनाकर बलि  नहीं दी जा सकती लेकिन आप चाहे जिस की बलि  दे हमे कोई एतराज नहीं । 

4. उन्हे भी कुर्बानी से एतराज़  है जिनके यहाँ नर बलि  दी जाती और इंसानों की बलि  देते आए है । 

5. क्या जानवरों की कुर्बानी का विरोध करने वाले बता सकते है कि दुनिया भर मे कुर्बानी का एक दिन है बाकि  दिन दुनिया मे कुर्बानी नहीं है फिर भी लाखों लाख बकरे व अन्य जानवर एक दिन मे काट दिये  जाते है । 

6. मैकडोनाल्ड  और तमाम होटलों मे परोसा जाने वाला मांस  का कोई विरोध नहीं  

7. एयरवेज़  मे होने वाले मांस  आपूर्ति  पर कोई विरोध नहीं । 

जो लोग इस्लाम को मानते है और जो लोग इस्लाम को नहीं  मानते है इन  दोनों मे फ़र्क  है फ़र्क यह है कि मुस्लिम इस्लाम मे दिए तमाम उसूलों  का पालन करना है और इसी पालन करने पर ही मुसलमान  है । 

जो लोग इस्लाम को नहीं मानते उन्हे असहमति  होने का पूरा हक है लेकिन वो मुसलमानों को बाध्य नहीं कर सकते कि मुसलमान कुरान मजीद न पढे, उसको न माने  ,नमाज़  न अदा करे ,, रोज़ा न  रखे ,कुर्बानी न दो ,ज़कात   न दो , हज न  करो  क्योंकि इसी बात से मुसलमान  और गैर  मुसलमान  का फ़र्क है । 

जानवरों की कुर्बानी का विरोध और दर्द होने का एहसास नहीं बल्कि मुससलमनो के रुसूमात और उनके मजहबी अकीदे / विश्वास   या धार्मिक आस्था पर चोट करने की नियत से यह प्रचार किया जाता है वरना  दुनिया भर मे लाखों जानवर , पंछी , मछलियाँ , आदि का शिकार होता है और मांस / गोश्त  खाया जाता है । 

कुर्बानी के द्वारा बांटा जाने वाला गोश्त पूरी दुनिया के गरीबों तक पहुंचता है । 


  

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