Ahmad Rizvi

हस्बुनाह किताबउल्लाह

अल्लाह के नबी रहमतुल आलमीन सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम का इरशाद है “ इन्नी तायरतुन फ़ीस सक़लैन किताबउल्लाह और इतरती” मै दो वज़नी चीज़े छोड़ जाता हूँ अल्लाह की किताब और इतरत अगर इन दोनों को थामे रहोगे तो गुमराह नहीं होगे, मगर उस दौर में भी ऐसे व्यक्ति थे जो रिसालत माब सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की मुखालफत करने की ज़ुर्रत रखते थे और उन्होंने मुखालफत की जबकि अल्लाह के नबी सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की एताअत वाजिब है जिसने भी यह कहा है “हस्बुनाह किताबउल्लाह” मेरे लिए अल्लाह की किताब काफी है , क्या यह कहना दुरूस्त है जबकि रसूलउल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम ने अल्लाह की किताब “कुरान मजीद “ और अपनी इतरत को थामने या मज़बूती से पकड़ने का हुक्म दिया है आगे देखते है कि हस्बुन्नाह किताबउल्लाह क्या किताब अल्लाह को बगैर इतरत के समझा जा सकता है अगर हाँ , तो कितना , अगर नहीं तो कितना ? अलिफ़ लाम मीम (सुरे बकरा, सुरे आले इमरान) अलिफ़ लाम मीम स्वाद (सुरे आराफ़) अलिफ़ लाम रा (सुरे युनुस, हूद, इब्राहीम, हज्र) काफ हा या   ऐन स्वाद (सूरे मरियम) ताहा (सूरे ताहा ) ता सीन मीम (सूरे शोरा) ता सीन (सूरे नम्ल) त...

कुर्बानी

कुर्बानी :  एक मित्र ने लिखा क्या कुर्बानी किसी जानवर की देनी जरूरी है दर्द होता है सभी को 

1. क्या सब्जी की कुर्बानी नहीं दी  जा सकती है ? 

पहले सवाल का जवाब किसी जानवर की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है इसमे कुछ शर्ते  है और हलाल जानवर की कुर्बानी दी जा सकती है ऊंट बकरा भैंसा  आदि पर कुर्बानी दी जा सकती है । 

दूसरी बात दूसरे धर्म के लोग मुसलमानों  को निशाना बनाने के लिए ही ऐसी बात करते है । 

1. पशुपति नाथ मंदिर मे बलि  दी जाती है तो वहाँ पर जानवर कटने  पर दर्द नहीं होता । 

2. कामाख्या देवी मंदिर (आसाम ) मे दी जाने वाली बलि  मे दर्द नहीं होता । 

3. तपेश्वरी देवी मंदिर मे  दी जाने वाली बलि  मे क्या दर्द नहीं होता क्या यहाँ पर महिष की बलि  के स्थान पर सब्जी के रूप मे महिष बनाकर बलि  नहीं दी जा सकती लेकिन आप चाहे जिस की बलि  दे हमे कोई एतराज नहीं । 

4. उन्हे भी कुर्बानी से एतराज़  है जिनके यहाँ नर बलि  दी जाती और इंसानों की बलि  देते आए है । 

5. क्या जानवरों की कुर्बानी का विरोध करने वाले बता सकते है कि दुनिया भर मे कुर्बानी का एक दिन है बाकि  दिन दुनिया मे कुर्बानी नहीं है फिर भी लाखों लाख बकरे व अन्य जानवर एक दिन मे काट दिये  जाते है । 

6. मैकडोनाल्ड  और तमाम होटलों मे परोसा जाने वाला मांस  का कोई विरोध नहीं  

7. एयरवेज़  मे होने वाले मांस  आपूर्ति  पर कोई विरोध नहीं । 

जो लोग इस्लाम को मानते है और जो लोग इस्लाम को नहीं  मानते है इन  दोनों मे फ़र्क  है फ़र्क यह है कि मुस्लिम इस्लाम मे दिए तमाम उसूलों  का पालन करना है और इसी पालन करने पर ही मुसलमान  है । 

जो लोग इस्लाम को नहीं मानते उन्हे असहमति  होने का पूरा हक है लेकिन वो मुसलमानों को बाध्य नहीं कर सकते कि मुसलमान कुरान मजीद न पढे, उसको न माने  ,नमाज़  न अदा करे ,, रोज़ा न  रखे ,कुर्बानी न दो ,ज़कात   न दो , हज न  करो  क्योंकि इसी बात से मुसलमान  और गैर  मुसलमान  का फ़र्क है । 

जानवरों की कुर्बानी का विरोध और दर्द होने का एहसास नहीं बल्कि मुससलमनो के रुसूमात और उनके मजहबी अकीदे / विश्वास   या धार्मिक आस्था पर चोट करने की नियत से यह प्रचार किया जाता है वरना  दुनिया भर मे लाखों जानवर , पंछी , मछलियाँ , आदि का शिकार होता है और मांस / गोश्त  खाया जाता है । 

कुर्बानी के द्वारा बांटा जाने वाला गोश्त पूरी दुनिया के गरीबों तक पहुंचता है । 


  

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