Ahmad Rizvi

कुफ़्र व मुनाफ़कत

 अल्लाह सुभान व तआला का इंकार करने वाला काफ़िर है लेकिन अल्लाह सुभान व तआला को मानता हो और इसके बाद भी काफ़िर हो इसकी कोई दलील है इब्लीस  अल्लाह को मानता है उसको सज्दा करता है लेकिन हज़रत आदम को सज्दा करने के अल्लाह के हुक़्म का इंकार करना इब्लीस को काफ़िर बनाता है | अब जो अल्लाह सुभान व तआला के हुक़्म फ़ैस्ले तकर्रूरी पर सहमत न हो वो काफ़िर है | एक और इन्सान भी है जो न मुस्लिम है और न काफ़िर है दो नम्बरी है, का ज़िक्र है वो मुनाफ़िक़ है |इस मुनाफ़िक़ के बारे मे यह है कि अल्लाह सुभान व तआला को मानता है रसूल उल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की रिसालत का इक़रार भी करता है मगर दिल से रसूल की गवाही नही देता है उसे मुनाफ़िक़ करार दिया गया है | आज कल लोग बड़े फ़ख्र से कहते है कि हम सेकुलर है जिसका मतलब ही मुनाफ़िक़ है |

कुर्बानी

कुर्बानी :  एक मित्र ने लिखा क्या कुर्बानी किसी जानवर की देनी जरूरी है दर्द होता है सभी को 

1. क्या सब्जी की कुर्बानी नहीं दी  जा सकती है ? 

पहले सवाल का जवाब किसी जानवर की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है इसमे कुछ शर्ते  है और हलाल जानवर की कुर्बानी दी जा सकती है ऊंट बकरा भैंसा  आदि पर कुर्बानी दी जा सकती है । 

दूसरी बात दूसरे धर्म के लोग मुसलमानों  को निशाना बनाने के लिए ही ऐसी बात करते है । 

1. पशुपति नाथ मंदिर मे बलि  दी जाती है तो वहाँ पर जानवर कटने  पर दर्द नहीं होता । 

2. कामाख्या देवी मंदिर (आसाम ) मे दी जाने वाली बलि  मे दर्द नहीं होता । 

3. तपेश्वरी देवी मंदिर मे  दी जाने वाली बलि  मे क्या दर्द नहीं होता क्या यहाँ पर महिष की बलि  के स्थान पर सब्जी के रूप मे महिष बनाकर बलि  नहीं दी जा सकती लेकिन आप चाहे जिस की बलि  दे हमे कोई एतराज नहीं । 

4. उन्हे भी कुर्बानी से एतराज़  है जिनके यहाँ नर बलि  दी जाती और इंसानों की बलि  देते आए है । 

5. क्या जानवरों की कुर्बानी का विरोध करने वाले बता सकते है कि दुनिया भर मे कुर्बानी का एक दिन है बाकि  दिन दुनिया मे कुर्बानी नहीं है फिर भी लाखों लाख बकरे व अन्य जानवर एक दिन मे काट दिये  जाते है । 

6. मैकडोनाल्ड  और तमाम होटलों मे परोसा जाने वाला मांस  का कोई विरोध नहीं  

7. एयरवेज़  मे होने वाले मांस  आपूर्ति  पर कोई विरोध नहीं । 

जो लोग इस्लाम को मानते है और जो लोग इस्लाम को नहीं  मानते है इन  दोनों मे फ़र्क  है फ़र्क यह है कि मुस्लिम इस्लाम मे दिए तमाम उसूलों  का पालन करना है और इसी पालन करने पर ही मुसलमान  है । 

जो लोग इस्लाम को नहीं मानते उन्हे असहमति  होने का पूरा हक है लेकिन वो मुसलमानों को बाध्य नहीं कर सकते कि मुसलमान कुरान मजीद न पढे, उसको न माने  ,नमाज़  न अदा करे ,, रोज़ा न  रखे ,कुर्बानी न दो ,ज़कात   न दो , हज न  करो  क्योंकि इसी बात से मुसलमान  और गैर  मुसलमान  का फ़र्क है । 

जानवरों की कुर्बानी का विरोध और दर्द होने का एहसास नहीं बल्कि मुससलमनो के रुसूमात और उनके मजहबी अकीदे / विश्वास   या धार्मिक आस्था पर चोट करने की नियत से यह प्रचार किया जाता है वरना  दुनिया भर मे लाखों जानवर , पंछी , मछलियाँ , आदि का शिकार होता है और मांस / गोश्त  खाया जाता है । 

कुर्बानी के द्वारा बांटा जाने वाला गोश्त पूरी दुनिया के गरीबों तक पहुंचता है । 


  

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