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Ahmad Rizvi

कुफ़्र व मुनाफ़कत

 अल्लाह सुभान व तआला का इंकार करने वाला काफ़िर है लेकिन अल्लाह सुभान व तआला को मानता हो और इसके बाद भी काफ़िर हो इसकी कोई दलील है इब्लीस  अल्लाह को मानता है उसको सज्दा करता है लेकिन हज़रत आदम को सज्दा करने के अल्लाह के हुक़्म का इंकार करना इब्लीस को काफ़िर बनाता है | अब जो अल्लाह सुभान व तआला के हुक़्म फ़ैस्ले तकर्रूरी पर सहमत न हो वो काफ़िर है | एक और इन्सान भी है जो न मुस्लिम है और न काफ़िर है दो नम्बरी है, का ज़िक्र है वो मुनाफ़िक़ है |इस मुनाफ़िक़ के बारे मे यह है कि अल्लाह सुभान व तआला को मानता है रसूल उल्लाह सलल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की रिसालत का इक़रार भी करता है मगर दिल से रसूल की गवाही नही देता है उसे मुनाफ़िक़ करार दिया गया है | आज कल लोग बड़े फ़ख्र से कहते है कि हम सेकुलर है जिसका मतलब ही मुनाफ़िक़ है |

उलूल अम्र

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उलूल अम्र सूरे निसा आयत नम्बर 59 “इमानवालों अल्लाह की एताअत करो रसूल और साहिबाने अम्र की एताअत करो जो तुम ही मे से है फिर अगर आपस मे किसी बात मे इखतेलाफ़ हो जाए तो उसे अल्लाह और रसूल की तरफ पलटा दो अगर तुम अल्लाह और रोज़े आखरत पर ईमान रखने वाले हो – यही तुम्हारे हक़ मे खैर और अंजाम के एतबार से बेहतरीन बात है” 1. इमानवालों से मतालबा है कि एताअत करे अल्लाह सुभान व तआला और रसूल उल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की और साहिबाने अम्र की । 2. अगर आपस मे किसी बात पर इखतेलाफ़ हो जाए तो हमे इखतेलाफ़ को दूर करने के लिए अल्लाह और रसूल की तरफ पलटना है यहाँ इखतेलाफ़ अगर उलूल अम्र मे है तो हमे अल्लाह और उसके रसूल की ओर देखना है हिदायत हमे अल्लाह और रसूल सल्लल्लाहों अलैह व आले वसल्लम से लेना है । अल्लाह सुभान व तआला व रसूलउल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व आले वसल्लम की एताअत मे कोई इखतेलाफ़ नहीं है । मगर उलेमा के द्वारा उलूल अम्र को समझने मे विरोधाभाष रहा है । सबसे पहले हम लोग अम्र को समझे अम्र क्या है जब अम्र समझ मे आ जाएगा तो साहबे अम्र या उलूल अम्र भी समझ पाएंगे । यहूदियों ने अल्लाह...